Sunday, October 28, 2012

किताब के पन्ने


मन भी अनोखे रिश्ते ढूंढता है 
किताबो के पन्नो में कुछ पलों को रोक कर 
दिल की गहराईयों में डूब कर खुद को टटोलता है 
और फिर उन्ही रिश्तों में उलझी ख़ुशी को संजोता हैI

ज़िन्दगी का एक और पन्ना पलटा 
कुछ लम्हों में एक नया अध्याय शुरू हो जाएगा 
पन्ने कभी चिपक भी जाया करते है 
कभी कभी उनमे अक्षर दुसरे पन्ने में उलट जाते हैI 

मन चाह कर भी उन पन्नो को खोल नहीं पाता 
उन उलटे अक्षरों को ज़िन्दगी की धारा में मोड़ नहीं पाता
दिल बेखबर उन पिछले पन्नो को बुकमार्क लगा जाता है
बार बार उन्ही लम्हों में खुद को कैद पाता हैI

मन और दिल की इस झड़प में वजूद हिल जाता है 
करवटों की आहटों से भी, बस अचानक जाग जाता है
सपने तो कई बार कभी अधूरे रह सकते है पर 
कुछ सपनो को वो काफी ईचे छोड़ आता है!

एक सवाल मेरे मन में छोड़ आया ये सपना 
ना जानू दिल ने देखा था इसे या था बस एक झरोखा 
ये भी नहीं पता के हार किसने मानी फिर 
दिल और मन की उलझन में किसे सम्भालूँ ...दिल है अपना या मन है अपना!

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