Wednesday, September 4, 2013

गुदगुदाना

धुँधली परछाईयों के बीच कहीं 

पलकों में कैद नमी में कभी 

यादों की पनघट पे हौले से 

सपनों की हलचल में छुपते हुए 



आना और बस बिचड़ जाना 

किस्मत का यूं पलट जाना 

कसमों का यूं टूट जाना 

लम्हों का ऐसे बिखर जाना 



यादो की गलियों में ये दस्तक 

गुदगुदा देता है कभी ... कभी छलका देता है 

भुला देता है कभी.… कभी सजा देता है 

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